Saturday, December 25, 2010

आपकी अमानत (आपकी सेवा में)


अल्लाह के नाम से जो अत्यन्त करूणामय और दयावान है।
मुझे क्षमा करना, मेरे प्रिय पाठकों! मुझे क्षमा करना, मैं अपनी और अपनी तमाम
मुस्लिम बिरादरी की ओर से आप से क्षमा और माफ़ी माँगता हूँ जिसने मानव जगत के सब से
बड़े शैतान (राक्षस) के बहकावे में आकर आपकी सबसे बड़ी दौलत आप तक नहीं पहुँचाई उस
शैतान ने पाप की जगह पापी की घृणा दिल में बैठाकर इस पूरे संसार को युद्ध का मैदान
बना दिया। इस ग़लती का विचार करके ही मैंने आज क़लम उठाया है कि आप का अधिकार (हक़)
आप तक पहुँचाऊँ और निःस्वार्थ होकर प्रेम और मानवता की बातें आपसे कहूँ।
वह सच्चा मालिक जो दिलों के भेद जानता है, गवाह है कि इन पृष्ठों को आप तक पहुँचाने
में मैं निःस्वार्थ हूँ और सच्ची हमदर्दी का हक़ अदा करना चाहता हूँ। इन बातों को
आप तक न पहुँचा पाने के ग़म में कितनी रातों की मेरी नींद उड़ी है। आप के पास एक
दिल है उस से पूछ लीजिये, वह बिल्कुल सच्चा होता है।


एक प्रेमवाणी
यह बात कहने की नहीं मगर मेरी इच्छा है कि मेरी इन बातों को जो प्रेमवाणी है, आप
प्रेम की आँखों से देखें और पढें। उस मालिक के लिए जो सारे संसार को चलाने और बनाने
वाला है ग़ौर करें ताकि मेरे दिल और आत्मा को शांति प्राप्त हो, कि मैंने अपने भाई
या बहिन की धरोहर उस तक पहुँचाई, और अपने इंसान होने का कर्तव्य पूरा कर दिया।
इस संसार में आने के बाद एक मनुष्य के लिए जिस सत्य को जानना और मानना आवश्यक है और
जो उसका सबसे बड़ा उत्तरदायित्व और कर्तव्य है वह प्रेमवाणी मैं आपको सुनाना चाहता
हूँ

प्रकृति का सबसे बड़ा सत्य
इस संसार बल्कि प्रकृति की सब से बड़ी सच्चाई है कि इस संसार सृष्टि और कायनात का
बनाने वाला, पैदा करने वाला, और उसका प्रबन्ध चलाने वाला सिर्फ और सिर्फ अकेला
मालिक है। वह अपने अस्तित्व (ज़ात) और गुणों मे अकेला है। संसार को बनाने, चलाने,
मारने, जिलाने मे उसका कोई साझी नहीं। वह एक ऐसी शक्ति है जो हर जगह मौजूद है, हर
एक की सुनता है और हर एक को देखता है। समस्त संसार में एक पत्ता भी उसकी आज्ञा के
बिना नहीं हिल सकता। हर मनुष्य की आत्मा की आत्मा इसकी गवाही देती है चाहे वह किसी
भी धर्म का मानने वाला हो और चाहे मुर्ति पूजा करता हो मगर अन्दर से वह यह विश्वास
रखता है कि पालनहार, रब और असली मालिक केवल वही एक है।
मनुष्य की बुद्धि में भी इसके अतिरिक्त कोई बात नहीं आती कि सारे सृष्टि का मालिक
अकेला है यदि किसी स्कूल के दो प्रिंसपल हों तो स्कूल नहीं चल सकता, एक गाँव के दो
प्रधान हों तो गाँव का प्रबंध नष्ट हो जाता है किसी एक देश के दो बादशाह नहीं हो
सकते तो इतनी बड़ी सृष्टि (संसार) का प्रबंध एक से ज्यादा खुदा या मालिकों द्वारा
कैसे चल सकता है, और संसार के प्रबंधक कई लोग किस प्रकार हो सकते हैं?

एक दलील
कुरआन जो ईश्वरवाणी है उसने संसार को अपने सत्य ईश्वरवाणी होने के लिए यह चुनौती दी
कि ‘‘अगर तुमको संदेह है कि कुरआन उस मालिक का सच्चा कलाम नहीं है तो इस जैसी एक
सुरह (छोटा अध्याय) ही बनाकर दिखाओ और इस कार्य के लिए ईश्वर के सिवा समस्त संसार
को अपनी मदद के लिए बुला लो, अगर तुम सच्चे हो। (सूर: बकरा, 23)
चैदह सौ साल से आज तक इस संसार के बसने वाले, और साइंस कम्पयूटर तक शोध करके थक
चुके और अपना अपना सिर झुका चुके हैं किसी में भी यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि यह
अल्लाह की किताब नहीं है।
इस पवित्र किताब में मालिक ने हमारी बुद्धि को समझाने के लिए अनेक दलीलें दी हैं।
एक उदाहरण यह हैं। ‘‘अगर धरती और आकाश में अनेक माबूद (और मालिक) होते तो ख़राबी और
फ़साद मच जाता‘‘। बात साफ है अगर एक के अलावा कई मालिक होते तो झगड़ा होता। एक कहता
अब रात होगी, दूसरा कहता दिन होग। एक कहता कि छः महीने का दिन होगा। एक कहता सूरज
आज पश्चिम से निकलेगा, दूसरा कहता नहीं पूरब से निकलेगा अगर देवी, देवताओं का यह
अधिकार सच होता और यह वह अल्लाह के कार्यां में शरीक भी होते तो कभी ऐसा होता कि एक
दास ने पूजा अर्चना करके वर्षा के देवता से अपनी बात स्वीकार करा ली, तो बड़े मालिक
की ओर से ऑर्डर आता कि अभी वर्षा नहीं होगी, फिर नीचे वाले हड़ताल कर देते। अब लोग
बैठे हैं कि दिन नहीं निकला, मालूम हुआ कि सूर्य देवता ने हड़ताल कर रखी है।

सच्ची गवाही
सच यह कि संसार की हर चीज गवाही दे रही है यह भली भॉति चलता हुआ सृष्टि का निज़ाम
(व्यवस्था) गवाही दे रहा है कि संसार का मालिक अकेला और केवल अकेला है। वह जब चाहे
और जो चाहे कर सकता है। उसको कल्पना और ख़्यालों में नहीं लाया जा सकता, उसकी
मूर्ति नहीं बनाई जा सकती। उस मालिक ने सारे संसार को मनुष्य की सेवा के लिए पैदा
किया। सूरज इंसान का सेवक, हवा इंसान की सेवक, यह धरती भी मनुष्य की सेवक है, आग
पानी जीव जन्तु, संसार की हर वस्तु मनुष्य की सेवा के लिए बनाई गयी हैं। इंसान को
इन सब चीजों का सरदार (बादशाह) बनाया गया है, तथा सिर्फ अपना दास और अपनी पूजा और
आज्ञा पालन के लिए पैदा किया है।
न्यायोचित और इंसाफ की बात यह है कि जब पैदा करने वाला, जीवन देने वाला, मारने
वाला, खाना पानी देने वाला और जीवन की हर एक आवश्यक वस्तु देने वाला वह है तो सच्चे
इंसान का अपना जीवन और जीवन से सम्बन्धित तमाम वस्तुएं अपने मालिक की मर्जी से, ओर
उसका आज्ञाकारी होकर प्रयोग करनी चाहिये। अगर एक मनुष्य अपना जीवन उस अकेले मालिक
की आज्ञा पालन में नहीं गुज़ार रहा है तो वह इंसान नहीं।

एक बड़ी सच्चाई
उस सच्चे मालिक ने अपने सच्चे प्रन्य, कुरआन मे एक सच्चाई हम को बताई है।
अनुवाद: हर एक जीवन को मौत का मज़ा चखना है। फिर तुम्हें हमारी ओर पलट कर आना होगा।
(सुरः अनकबूत 58)
इस आयत के दो भाग हैं। पहला यह है कि हर धर्म, हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है।
यह ऐसी बात है कि हर धर्म, हर समाज और हर जगह का आदमी इस बात पर यक़ीन रखता है
बल्कि जो धर्म को मानता भी नहीं वह भी सच्चाई के आगे सिर झुकाता है और जानवर तक मौत
की सच्चाई को समझते हैं। चूहा बिल्ली को देखकर भागता है और कुत्ता भी सड़क पर आती
हुई किसी गाड़ी को देखकर भाग उठता है। इसलिए कि इन की मौत का यक़ीन (विश्वास) है।

मौत के बाद
इस आयत के दूसरे भाग में कुरआन मजीद एक बड़ी सच्चाई की तरफ हमें आकर्षित करता है
यदि वह इंसान की समझ मे आ जाये तो सारे संसार का वातावरण बदल जाये। वह सच्चाई यह है
कि तुम मरने के बाद मेरी तरफ़ लौट जाओगे और इस संसार में जैसे भी कार्य करोगे वैसा
बदला पाओगे।
मरने के बाद तुम गल सड़ जाओगे और दोबारा पैदा नही किये जाओगे ऐसा नहीं है। न ही यह
सत्य है कि मरने के बाद तुम्हारी आत्मा किसी योनि में प्रवेश कर जायेगी। यह
दृष्टिकोण किसी मानवीये बुद्धि की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
पहली बात यह है कि आवागमण का यह दृष्टिकोण वेदों में उपलब्ध नहीं है। बाद के
पुराणों में इसका उल्लेख है उस से ज्ञात होता है कि इंसान के शुक्राणुओं पर लिखे
सन्तानों के गुण पिता से पुत्र ओर पुत्र से उसके पुत्र में जाते हैं। इस धारणा का
आरम्भ इस तरह हुआ कि शैतान (राक्षस) ने धर्म के नाम पर लोगों को ऊँच नीच में बांध
दिया। धर्म के नाम पर शुद्रों से सेवा लेने और उनकों नीच समझने वाले धर्म के
ठेकेदारों से समाज के दबे कुचले लोगों ने जब यह सवाल किया कि जब हमारा पैदा करने
वाला ईश्वर है उसने सब इंसानों को आँख, कान, नाम हर चीज में बराबर बनाया है तो आप
लोगों ने अपने आप को बड़ा और हमें नीचा क्यांे बनाया। इसके लिए उन्होंने आवागमन का
सहारा लेकर यह कह दिया कि तुम्हारे पिछले ज़न्म के कर्मो ने तुम्हें नीच बनाया है।
इस धारणा के अन्तर्गत सारी आत्मायें दोबारा पैदा होती हैं। और अपने कर्मो के हिसाब
से योनि बदलकर आती है। अधिक कुकर्म करने हैं। उनसे अधिक कुकर्म करने वाले वनस्पति
की योनि में चले जाते हैं, और जिसके कर्म अच्छे होते है वह मोक्ष प्राप्त कर लेते
हैं।

आवागमन के तीन विरोधी
तर्क (दलीलें)
इस क्रम मे सबसे बड़ी बात यह है कि सारे संसार के विद्वानों और शोध कार्य करने वाले
साइंस दानों का कहना है कि इस धरती पर सबसे पहले वनस्पति जगत ने जन्म लिया। फिर
जानवर पैदा हुए और उसके करोड़ों वर्ष बाद इन्सान का जन्म हुआ। अब जबकि इंसान अभी इस
धरती पर पैदा ही नही हुए थे और किसी इन्सानी आत्मा ने अभी बुरे कर्म नहीं किए थे तो
किन आत्माओं ने वनस्पति और जानवरों के शरीर में जन्म लिया?
दूसरी बात यह है कि इस धारणा का मान लेने के बाद यह मानना पड़ेगा कि इस धरती पर
प्राणियों की संख्या में लगातार कमी होती रहे। जो आत्मायें मोक्ष प्राप्त कर लेंगी।
उनकी संख्या कम होती रहनी चाहिये। अब कि यह तथ्य हमारे सागने है कि इस विशाल धरती
पर इन्सान जीव जन्तु और वनस्पति हर प्रकार के प्राणियों की जनसंख्या में लगातार
वृद्धि हो रही है।
तीसरी बात यह है कि इस संसार में जन्म लेने वालों और मरने वालों की संख्या में
ज़मीन आसमान का अन्तर दिखाई देता है। मरनेवाले मनुष्य की तुलना में जन्म लेने वाले
बच्चों की संख्या कहीं अधिक है। कभी-कभी करोड़ो मच्छर पैदा हो जाते है जब कि मरने
वाले उससे बहुत कम होते है। कहीं-कहीं कुछ बच्चों के बारे में यह मशहूर हो जाता है
कि वह उस जगह को पहचान रहा है जहा वह रहता था, अपना पुराना, नाम बता देता है। और यह
भी कि वह दोबारा जन्म ले रहा है। यह सब शैतान और भूत-प्रेत होते हैं जो बच्चों के
सिर चढ़ कर बोलते है और इन्सानों के दीन ईमान को खराब करते हैं।
सच्ची बात यह है कि यह सच्चाई मरने के बाद हर इन्सान के सामने आ जायेगी कि मनुष्य
मरने के बाद अपने मालिक के पास जाता है, और इस संसार मे उसने जैसे कर्म किये है
उनके हिसाब से सज़ा अथवा बदला पायेगा।
कर्मो का फल मिलेगा
यदि वह सतकर्म करेगा भलाई और नेकी की राह पर चलेगा तो वह स्वर्ग में जायेगा। स्वर्ग
जहाँ हर आराम की चीज़ है। और ऐसी-ऐसी सुखप्रद और आराम की चीज़ें है जिनकों इस संसार
में न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना, और न किसी दिल में उसका ख़्याल
गुजारा। और सबसे बड़ी जन्नत (स्वर्ग) की उपलब्धि यह होगी कि स्वर्गवासी लोग वहॉ
अपने मालिक के अपनी आँखों से दर्शन कर सकेंगे। जिसके बराबर विनोद और मजे़ कोई चीज
नहीं होगी।
इस प्रकार जो लोग कुकर्म (बुरे काम) करेंगे, पाप करके अपने मालिक की आज्ञा का
उल्लंघन करेंगे, वह नरक मे डाले जायेगे, वह वहॉ आग में जलेंगे। वहॉ उन्हें हर पाप
की सज़ा और दंड मिलेगा। और सब से बड़ी सजा यह होगी कि वह अपने मालिक के दर्शन से
वंचित रह जाऐगे। और उन पर उनके मालिक का अत्यन्त क्रोध होगा।­

ईश्वर का साझी बनाना
सबसे बड़ा पाप है
उस सच्चे मालिक ने अपने कुरआन में हमें बताया कि नेकियों, सतकर्म, पुण्य ओर सदाचार
छोटे भी होते हैं और बड़े भी इसी प्राकर उस मालिक के यहॉ गुनाह, कुकर्म, पाप भी
छोटे बड़े होते हैं उसने हमें बताया है कि जो पाप हमें सब से अधिक सज़ा का भागीदार
बनाता है, और जिसको वह कभी क्षमा नही करेगा, और जिस का करने वाला सदैव नरक में जलता
रहेगा, ओर उसको मौत भी न आयेगी वह उस अकेले मालिक का किसी को साझी बनाना है, अपने
शीश और मस्तिष्क को उसके अतिरिक्त किसी दूसरे के आगे झुकाना, अपने हाथ किसी और के
आगे जोड़ना, उसके अलावा किसी और को पूजा के योग्य मानना, मारने वाला जिन्दा करने
वाला, रोजी देने वाला और लाभ हानि का मालिक समझना घोर पाप और अत्यन्त अत्याचार है
चाहे वह किसी देवी देवता को माना जाये या सूरज चाँद नक्षत्र अथवा किसी पीर फ़कीर
को। किसी को भी उस मालिक के अलावा पूजा योग्य समझना शिर्क है जिसको वह मालिक कभी
माफ़ नहीं करेगा,
mail me

आपकी अमानत (आपकी सेवा में)

पुस्‍तकः आपकी अमानत (आपकी सेवा में) मौलाना मुहम्मद क़लीम सिद्दीक़ी
दो शब्द
यदि आग की एक छोटी सी चिंगारी आपके सामने पड़ी हो और एक अबोध बच्चा सामने से नंगे पाँव आ रहा हो और उसका नन्हा सा पाँव सीधे आग पर पड़ने जा रहा हो तो आप क्या करेंगे?आप तुरन्त उस बच्चे को गोद में उठा लेंगे और आग से दूर खड़ा करके आप अपार प्रसन्नता का अनुभव करेंगें।इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य आग में झुलस जाये या जल जाये तो आप तड़प जाते हैं और उसके प्रति आपके दिल में सहानुभूति पैदा हो जाती है।क्या आपने कभी सोचा अखिर ऐसा क्यों है? इसलिए कि समस्त मानव समाज केवल एक मातृ-पिता की संतान है और हर एक के सीने में एक धड़कता हुआ दिल है जिसमें प्रेम है हमदर्दी है और सहानुभूति है वह एक दूसरे के दुःख सुख मे तड़पता है और एक दूसरे की मदद करके प्रसन्न होता है। इसलिए सच्चा इन्सान और मानव वही है जिसके सीने में पूरी मानवता के लिए प्रेम उबलता हो, जिसका हर कार्य मानवता की सेवा के लिए हो और जो हर एक को दुःख दर्द मे देखकर तड़प जाए और उसकी मदद उसके जीवन का अटूट अंग बन जाए।इस संसार में मनुष्य का यह जीवन अस्थाई है, और मरने के बाद उसे एक और जीवन मिलेगा जो स्थाई होगा। अपने सच्चे मालिक की उपासना, और केवल उसी की माने बिना मरने के बाद के जीवन में स्वर्ग प्राप्त नहीं हो सकता और सदा के लिए नरक का ईंधन बनना पड़ेगा।आज लाखों करोड़ो आदमी नरक का ईधन बनने की होड़ में लगे हुए हैं और ऐसे मार्ग पर चल रहे हैं जो सीधे नरक की ओर जाता है। इस वातावरण में उन तमाम लोगों का दायित्व है जो मानव समूह से प्रेम करते हैं और मानवता में आस्था रखते हैं कि वे आगे आयें और नरक में गिर रहें इंसानों को बचाने का अपना कर्तव्य पूरा करें।हमें खुशी है कि मानव जाति से सच्ची सहानुभूति रखने वाले और उनको नरक की आग से बचा लेने के दुख में घुलने वाले मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दी़क़ी ने प्रेम और स्नेह के कुछ फूल प्रस्तुत किये हैं जिसमें मानवता के प्रति उनका पे्रम साफ़ झलकता है और इसके माध्यम से उन्होंने वह कर्तव्य पूरा किया है जो एक सच्चे मुसलमान होने के नाते हम सब पर है।इन शब्दों के साथ दिल के ये टुकड़े और आप की अमानता आप के समक्ष प्रस्तुत है।

Friday, July 3, 2009

इंसान था पहले बन्दर ...

आज हमारे मुल्क में भी सम्लेंगिकता को वैध करार दे दिया गया है और गे कम्युनिटी इसको सलेब्राते कर रहे हैं लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है की कोई और भी है जो इसको सलेब्राते कर रहा है और वो हैं बन्दर क्यूँ के उनको खुशी है के इंसान जो पहले बन्दर थे फिर से बंदर बन्ने जा रहे है और बंदरों को अपने पूर्वजों को फिर से पा लेने की खुशी हो रही है !

Wednesday, June 10, 2009

kufr

बुतों से तुझ को उम्मीदें खुदा से न उम्मीदी ,
मुझे बता तो सही और काफिरी क्या है !

Sunday, March 29, 2009

शारीयत...

साथियों आज तालिबान और शारीयत को हर न्यूज़ चैनल भुना रहा है ! सोचा हम सब का इस बारे में जानना चाहिए! एक वेबसाईट बनी है ISLAMDHARMA.ORG जो आप की इस जानकारी के लिए मदद कर सकती है!
धन्यवाद्

Monday, November 10, 2008

The Carpenter

A highly skilled carpenter who had grown old was ready to retire. He told his employer-contractor of his plans to leave the house building business and live a more leisurely life with his family. He would miss the paycheck, but he needed to retire.The employer was sorry to see his good worker go and asked if he could build just one more house as a personal favor. The carpenter agreed to this proposal but made sure that this will be his last project. Being in a mood to retire, the carpenter was not paying much attention to building this house. His heart was not in his work. He resorted to poor workmanship and used inferior materials. It was an unfortunate way to end his career.When the job was done, the carpenter called his employer and showed him the house. The employer handed over some papers and the front door key to the carpenter and said "This is your house, my gift to you."The carpenter was in a shock! What a shame! If he had only known that he was building his own house, he would have made it better than any other house that he ever built! Our situation can be compared to this carpenter. Allah Ta'la has sent us to this world to build our homes in paradise by obeying His commands. Now, we have to decide how well we wish to build the homes where we will live forever.